ध्वनि किसे कहते हैं? परिभाषा, गुण, लक्षण, प्रकार ( Dhwani kya hai )

नमस्कार आज हम भौतिक विज्ञान के महत्वपूर्ण अध्याय में से एक ध्वनि किसे कहते हैं? परिभाषा, गुण, लक्षण, प्रकार ( Dhvani kya hai ) के विषय में अध्ययन करेंगे। इस यह अध्याय के अध्ययन के दौरान हम इससे सम्बंधित विभिन्न बिन्दुओ पर चर्चा करेंगे तथा जानेंगे की ध्वनि किसे कहते हैं? ध्वनि की परिभाषा, ध्वनि के गुण, ध्वनि के लक्षण, ध्वनि के प्रकार ( Dhvani kya hai ) इत्यादि के बारे में चर्चा करेंगे।

वैसे तो यह अध्याय काफी महत्वपूर्ण है। जैसा की आपने देखा ही होगा की किस प्रकार से बहुत से एग्जाम में इस से समबन्धित बहुत से प्रश्न देखने को मिलते हैं। इसलिए आपको इस अध्याय से समबन्धित बहुत से महत्वपूर्ण प्रश्न यहां पर दिए गए है जिनके अध्ययन से आप अपनी तयारी को और अधिक तरीके से एक उचित दिशा दे पाएंगे। तो आइये शुरू करते है इस महत्वपूर्ण टॉपिक के बारे में अध्ययन।

ध्वनि किसे कहते हैं?

सामान्यता आपके मन में भी एक प्रश्न उत्पन्न होता होगा की ध्वनि किसे कहते हैं? तो आपको बता दे की

● साधारणतया हमारे कानों को जो सुनाई देता है, वह ध्वनि है। ध्वनि सदैव कंपन से ही उत्पन्न होती है अर्थात बिना कंपन के ध्वनि उत्पन्न नहीं की जा सकती।
● किसी माध्यम में किसी ध्वनि-स्रोत द्वारा बाधा उत्पन्न करने पर माध्यम में अनुप्रस्थ या अनुदैर्ध्य तरंग उत्पन्न हो जाती है। जो हमारे कानों को जो तरंगे सुनाई देती है, उसे हम ध्वनि कहते हैं।

ध्वनि की परिभाषा

“ध्वनि एक प्रकार का कम्पन या विक्षोभ है। जो किसी ठोस , द्रव, व गैस के माध्यम से संचारित होती है। मुख्य रूप से उन कम्पनों को ही ध्वनि कहते है। जो मानव के कान से सुनाई देते है।”

ध्वनि तरंग (Wave)

ये एक प्रकार का विक्षोभ है जो किसी निकाय/माध्यम की साम्यावस्था में विचलन उत्पन्न कर देती है।
तरंग अपनी गति के दौरान ऊर्जा व संवेग का भी वहन करती है।
जब तरंग किसी माध्यम में गति करती है तो माध्यम के कण अपनी माध्य अवस्था के इर्दगिर्द कम्पन्न करते हैं, हालांकि इनमें स्थायी विस्थापन नहीं होता है।
किसी एक माध्यम में तरंग की चाल नियत बनी रहती है।
तरंग संचरण के लिए माध्यम प्रत्यास्थ (Elastic) हो तथा इसमें जड़त्व (Inertia) होना चाहिए।
माध्यम का घनत्व एक समान होना चाहिए।
माध्यम के कणों में घर्षण (Fraction) कम होना चाहिए।

ध्वनि तरंगों का वर्गीकरण

माध्यम की आवश्यकता के आधार पर:-

(1) यांत्रिक तरंगें (Mechanical Waves):-
ये केवल किसी माध्यम में ही उत्पन्न की जा सकती है। जैसे- ध्वनि तरंगें।

(2) विद्युत चुम्बकीय तरंगें (Electromagnetic Waves):-
ये माध्यम के निर्वात में भी उत्पन्न की जा सकती हैं। जैसे- एक्स-रे, प्रकाश, UV Rays, अवरक्त आदि।

तरंग गति व माध्यम के कणों के कम्पन्न के आधार पर:-

(i) अनुप्रस्थ तरंगें (Transverse Waves):-
माध्यम के कणों में कम्पन्न व तरंग की गति एक-दूसरे के लम्बवत् (Perpendicular) होती है।
ये तरंगें ठोस माध्यम में तथा द्रवों की सतह पर उत्पन्न होती है
उदाहरण- रस्सी में उत्पन्न तरंगें, जल की सतह पर उत्पन्न तरंगें।

(ii) अनुदैर्ध्य तरंगें (longitudinal Waves):-
माध्यम के कणों में कम्पन्न व तरंग की गति एक-दूसरे के अनुदिश होती है।
ये तरंगें ठोस, द्रव व गैस तीनों माध्यम से उत्पन्न होती है। उदाहरण- वायु में ध्वनि तरंगें
नोट:- वायु/गैस में उत्पन्न ध्वनि तरंगें अनुदैर्ध्य तरंगें होती हैं जबकि ठोस व द्रवों में ये ध्वनि तरंगें अनुप्रस्थ व अनुदैर्ध्य दोनों हो सकती हैं।

ऊर्जा संचरण के आधार पर:-

(i) प्रगामी तरंगें:-
– ये माध्यम में ऊर्जा का संचरण करती हैं। उदाहरण- ध्वनि तरंगें, प्रकाश तरंगें।

(ii) अप्रगामी तरंगें:-
– ये माध्यम में ऊर्जा का संचरण नहीं करती हैं। उदाहरण- दृढ़ सिरों के बीच बंधे तार या रस्सी में उत्पन्न तरंगें।

तरंगों के आधारभूत घटक

आयाम (Amplitude):-
– तरंग गति के दौरान माध्य अवस्था से माध्यम के कणों का अधिकतम विस्थापन आयाम कहलाता है।
– यदि ध्वनि का आयाम अधिक है तो ऐसी ध्वनि की तीव्रता (Intensity) भी अधिक होगी तथा ये दूर तक सुनाई देगी।

आवृत्ति (Frenquency):-
– किसी बिंदु से प्रति सेकण्ड गुजरने वाली तरंगों की संख्या, तरंग की आवृत्ति कहलाती है।
– जिस ध्वनि तरंग की आवृत्ति ज्यादा हो वह ध्वनि तरंग उतनी ही तीक्ष्ण (Sharp) होती है।
– आवृत्ति का SI मात्रक हर्ट्ज होता है।

तरंग लम्बाई (Wave length):-
– किसी एक तरंग की लम्बाई, तरंग आवृत्ति के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
– इसे lemdaसे प्रदर्शित करते हैं।
– तरंगदैर्ध्य का SI मात्रक मीटर होता है।

आवृत्ति (Frequency)- 

किसी माध्यम में तरंग संचरित होने पर, माध्यम का कोई भी कण एक सेकण्ड में जितने कंपन करता है उस संख्या को तरंग की ‘आवृत्ति’ कहते हैं। इसे n से प्रदर्शित करते हैं।

ध्वनि किसे कहते हैं? परिभाषा, गुण, लक्षण, प्रकार ( Dhwani kya hai )

आवर्तकाल (Time Period)- 

किसी माध्यम में तरंग संचरित होने पर माध्यम का कोई भी कण अपना एक कंपन पूरा करने में जितना समय लेता है, उसे तरंग का ‘आर्वतकाल’ कहते हैं।

विद्युत-चुंबकीय तरंगें (Electromagnetic Waves) यांत्रिक तरंगों के अतिरिक्त अन्य प्रकार की तरंगें भी होती हैं, जिनके संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता नहीं होती तथा वे तरंगे निर्वात में भी संचरित हो सकती हैं। इन्हें विद्युत चुंबकीय तरंगें कहते हैं
i. गामा किरणें (g – Rays)– इन्हें हेनरी बैकेरल ने खोजा। इनकी भेदन क्षमता तीव्र होती है। अतः इनका उपयोग कृत्रिम रेडियोधर्मिता में किया जाता है।

ii. एक्स किरणें (X-Rays)- इनकी खोज डब्ल्यू. के. रॉन्टजन ने की थी। इनका उपयोग चिकित्सा एवं औद्योगिक क्षेत्र में किया जाता है।

iii. पराबैंगनी किरणें (Ultra-Violet Rays)- इनकी खोज रिटर ने की। बैक्टीरिया नष्ट करने में इसका उपयोग किया जाता है

iv. दृश्य विकिरण (Visible Radiation)- इनकी खोज न्यूटन ने की इसी के कारण हमें वस्तुएँ दिखाई देती हैं।

ध्वनि के प्रकार

श्रव्य तरंगें (Audible Waves):-
– इनकी आवृत्ति 20 Hz से 20,000 Hz तक होती है।
– मनुष्य का कान केवल इन्हीं तरंगों को सुन पाता है।

अपश्रव्य तरंगें (In/rasonic Waves):-
– इनकी आवृत्ति 20 Hz से कम होती है।
– अपश्रव्य तरंगें भूकंप की मुख्य प्रघाती तरंगों से पहले उत्पन्न होती हैं।
– कुछ कीट, कुत्ते आदि इन तरंगों का अनुभव कर सकते हैं।

पराश्रव्य आवृत्ति (Ultrasonic Waves):-
 – इनकी आवृत्ति 20000 Hz से अधिक होती है।
– इन तरंगों का प्रयोग गर्भस्थ शिशु की जाँच करने में किया जाता है।
– इन तरंगों का प्रयोग कीटों/मच्छरों आदि को भगाने या मारने में किया जाता है।
– औद्योगिक इकाइयों में चिमनी में जमा हुए कार्बन को हटाने में इनका प्रयोग किया जाता है।
– अँधेरे में उड़ते समय चमगादड़ इन्हीं तरंगों का उत्पादन करता है तथा परावर्तित किरणों की सहायता से रास्ते में अवरोध का पता लगाता है।
– पनडुब्बी (Submarine) के मार्ग में उपस्थित अवरोध या किसी अन्य पनडुब्बी की स्थिति व उसकी गति आदि की जानकारी के लिए SONAR (Sound Navigation and Ranging) का प्रयोग करते हैं, ये पराश्रव्य तरंगें उत्पन्न करता है।

ध्वनि का संचरण (Propagation of Sound)

किसी वस्तु के कंपन करने पर ध्वनि उत्पन्न होती है। यह ध्वनि वस्तु से हमारे कान तक वायु के माध्यम में चलकर आती है। यदि वस्तु तथा हमारे कान के बीच वायु न हो, तो ध्वनि हमारे कान तक नहीं आ सकती है।

विभिन्न माध्यमों में ध्वनि का संचरण (Propagation of Sound in different Medium)

ध्वनि को प्रगमन के लिए द्रव्यात्मक माध्यम आवश्यक होता है। ध्वनि तरंगों के संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है। जैसे – वायु

● ठोस, द्रव तथा गैस द्रव्यात्मक माध्यम कहलाते हैं।
● ध्वनि तरंगे, यांत्रिक तरंगे कहलाती हैं, क्योंकि उन्हें उनके संचरण के लिए द्रव्यात्मक माध्यम (ठोस, द्रव्य या गैस के समान) आवश्यक होता है।
● यही कारण है कि गोताखोर जल के भीतर होने पर भी ध्वनि को सुन लेता है। उसी प्रकार रेल की पटरी से कान लगाकर बहुत दूर से आती रेलगाड़ी की ध्वनि सुनी जा सकती है। द्रवों में ध्वनि गैसों की अपेक्षा तेजी से चलती है
● ध्वनि एक प्रकार की ऊर्जा है और यह एक स्थान से दूसरे स्थान तक माध्यम के द्वारा ही चलती है। जिस रीति से ध्वनि किसी माध्यम में चलती है उसको तरंग गति’ (wave motion) कहते हैं।
उदाहरण –जब हम किसी तालाब के शान्त जल में एक पत्थर फेंकते हैं तो जिस स्थान पर तालाब में पत्थर गिरता है वहाँ पर जल में हलचल उत्पन्न हो जाती है। यह हलचल थोड़े ही समय में फैलती हई तालाब के किनारों तक चली जाती है। जल के कण अपने पास के कणों को गतिमान कर देते हैं। इस प्रकार प्रत्येक गतिमान कण, अपने पास के कणों को गतिमान करता जाता है जब तक कि यह हलचल तालाब के किनारों तक नहीं पहुँच जाती।
● इस प्रकार माध्यम के कण अपने ही स्थान पर ऊपर नीचे हिलते रहकर माध्यम की हलचल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचा देते हैं। अत: इसी प्रकार जब कोई वस्तु कंपन करती है तो वह अपने समीप के माध्यम के कणों को गतिमान कर देती है।
● इस प्रकार तरंग माध्यम में होने वाली वह हलचल है जो बिना रूप बदले माध्यम के कणों के द्वारा एक निश्चित वेग से आगे बढ़ती है। तरंग का यह वेग माध्यम की प्रकृति पर निर्भर करता है।

ध्वनि की चाल (Speed of Sound)

ध्वनि को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचने में समय लगता है, ध्वनि की चाल कहलाती है।

उदाहरण – 

क्रिकेट का खिलाड़ी जब बल्ले से गेंद में चोट मारता है तो दूर बैठे दर्शकों को गेंद पहले दिखाई दे जाती है, चोट की ध्वनि बाद में सुनाई देती है। बरसात के दिनों में आकाश में बिजली की चमक तथा कड़क एक साथ उत्पन्न होती हैं, परन्तु चमक पहले दिखाई देती है तथा कड़क की ध्वनि बाद में सुनाई देती है।
● इसी प्रकार, दूर खड़ा कोई व्यक्ति जब बंदूक दागता है तो बंदूक से निकला धुँआ पहले दिखाई दे जाता है, ध्वनि बाद में सुनाई देती है।
● ध्वनि को एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में, प्रकाश की अपेक्षा, अधिक समय लगता है। ध्वनि तरंगें अनुप्रस्थ तथा अनुदैर्ध्य दोनों प्रकार की हो सकती हैं तथा विभिन्न माध्यमों में उत्पन्न तरंगों की चाल भिन्न-भिन्न होती है।
● अनुप्रस्थ तरंगें केवल ठोस माध्यम में ही संभव हैं क्योंकि ठोस में दृढ़ता होती है, जबकि अनुदैर्ध्य तरंगें ठोस, द्रव तथा गैस तीनों प्रकार के माध्यमों में संचरित हो सकती हैं। किसी माध्यम में अनुदैर्ध्य तरंगों की चाल केवल माध्यम के गुणों पर निर्भर करती है, तरंग के आयाम पर नहीं। माध्यम के वह गुण जिनके द्वारा अनुदैर्ध्य तरंगों की चाल नियंत्रित होती है- प्रत्यास्थता तथा घनत्व हैं।
● गैसों के सापेक्ष द्रवों में प्रत्यास्थता अधिक होती है तथा ठोसों में सबसे अधिक होती है। यही कारण है कि द्रवों में ध्वनि की चाल गैसों की अपेक्षा अधिक तथा ठोसों में सबसे अधिक होती हैं। यदि रेल की पटरी पर एक व्यक्ति हथोड़े से चोट करे तथा कुछ दूरी पर दूसरा व्यक्ति सुने तो उसे थोडे समय के अन्तर से दो ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। पहली ध्वनि पटरी में होकर पहुचती हैं तथा दूसरी वायु में होकर यदि दूसरा व्यक्ति अपना कान पटरी से लगा ले तो पहले पहुँचने वाली ध्वनि तीव्र लगती है परंतु बाद में पहुँचने वाली वैसी ही रहती है।

ध्वनि की विशेषताएँ (Characteristics of Sound)

तीव्रता (Intensity):-
तीव्रता ध्वनि का वह लक्षण है जिससे ध्वनि धीमी या मंद अथवा तीव्र या प्रबल सुनाई देती है।
● ध्वनि की तीव्रता एक भौतिक राशि है, जिसे शुद्धता से मापा जा सकता है। माध्यम के किसी बिन्दु पर ध्वनि की तीव्रता, उस बिन्दु पर एकांक क्षेत्रफल से प्रति सेकण्ड तल के लम्बवत वाली ऊर्जा के बराबर होती है।
● इसका SI मात्रक माइक्रोवाट/मी.2 तथा प्रयोगात्मक मात्रक बेल है।
● ध्वनि की तीव्रता, ध्वनि स्रोत की शक्ति पर, श्रोता तथा स्रोत के बीच दूरी पर तथा छत, फर्श और दीवारों पर होने वाले परावर्तनों पर निर्भर करती है।
● यदि ध्वनि स्रोत को बिन्दु माना जाए तथा अवशोषण और परावर्तनों को नगण्य मान लिया जाये, तो ध्वनि की तीव्रता स्रोत से दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
● विश्व स्वास्थ्य संगठन W.H.O. के अनुसार 45 डेसीबल ध्वनि मानव के लिए सर्वोत्तम होती है। W.H.O. ने 75 डेसीबल से ऊपर की ध्वनि को मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना है।
● एक साधारण मानव अधिक-से-अधिक 130 डेसीबल तीव्रता वाली ध्वनि सुन सकता है, लेकिन 85 डेसीबल से अधिक ध्वनि में व्यक्ति बहरा हो सकता है।

पिच/तारत्व/तीक्ष्णता:-
तारत्व, ध्वनि का वह लक्षण है, जिसके कारण ध्वनि को मोटी या तीक्ष्ण कहा जाता है।
● तारत्व, आवृत्ति पर निर्भर करता है।
● जैसे-जैसे ध्वनि की आवृत्ति बढ़ती है, वैसे-वैसे ध्वनि का तारत्व बढ़ता जाता है तथा ध्वनि तीक्ष्ण अथवा पतली होती जाती है।
● बच्चों एवं स्त्रियों की पतली आवाज तारत्व अधिक होने के कारण ही होती है पुरुषों की मोटी आवाज तारत्व कम होने के कारण होती है।
● ध्वनि के तारत्व का ध्वनि की तीव्रता से कोई संबंध नहीं होता है। अधिक प्रबल ध्वनि का तारत्व कम अथवा अधिक कुछ भी हो सकता है।
● उदाहरण – शेर की दहाड़ एक तीव्र ध्वनि है लेकिन इसका तारत्व बहुत ही कम होता है, जबकि मच्छर की भिनभिनाहट एक धीमी ध्वनि है लेकिन इसका तारत्व शेर की दहाड़ से अधिक होता है।

प्रबलता (Loudness) ध्वनि की प्रबलता, कान तक प्रति सेकण्ड पहुँच रही ध्वनि-ऊर्जा की माप है।
● ध्वनि की प्रबलता ध्वनि तरंगों के आयाम पर निर्भर होती है। ध्वनि तरंगों का आयाम जितना अधिक होगा ध्वनि की प्रबलता उतनी ही अधिक होगी।
● प्रबलता की इकाई “फोन” है। कान 1 किलोहर्ट्स तक की आवृत्ति के लिए सर्वाधिक संवेदनशील होता है।
● प्रत्यावर्ती प्रबलता का मापक पैमाना ‘सोन’ है। यह हमारे कानों की सुग्राहिता पर निर्भर करती है। इसका SI मात्रक वाट/मीटर होता है।
● उदाहरण – तीव्रता की ध्वनि एक सामान्य व्यक्ति के लिए काफी प्रबल होगी किन्तु एक बहरे व्यक्ति के लिए प्रबलता शून्य होगा।

गुणता (Quality):-
– ये ध्वनि की तीव्रता व तीक्ष्णता के मिश्रित प्रभाव से बना गुण है जिसकी सहायता से हम ध्वनि की पहचान करते हैं।

नोट:-
– मनुष्य को सुनाई देने के लिए ध्वनि तरंग की निम्नतम तीव्रता को ‘देहली तीव्रता’ कहते हैं।
– मनुष्य के लिए देहली तीव्रता 0 डेसीबल होती है।
0 डेसीबल – 10-12 watt/meter2 (देहली तीव्रता)
10 डेसीबल – 10-11 watt/meter2 (ध्वनिरोधी कमरे)
20 डेसीबल – 10-10 watt/meter2 (Radio, TV के लिए Recording Room)
30 डेसीबल – 10-9 watt/meter2 (शांत कमरे में)

नोट:-
– WHO के अनुसार 85 डेसीबल से अधिक तीव्रता की ध्वनि ‘शोर’ कहलाती है।
– ध्वनि का संचरण (Propogation of Sound)
– ध्वनि का संचरण केवल माध्यम में ही संभव होता है।
– माध्यम में ध्वनि का संचरण उसके प्रत्यास्थता, घनत्व, ताप आदि पर भी निर्भर करता है।

ध्वनि पर माध्यम का प्रभाव:-
– जिस माध्यम की प्रत्यास्थता अधिक होगी, उस ध्वनि का वेग भी अधिक होगा। यही कारण है कि ठोस माध्यम में ध्वनि का वेग अधिकतम व गैसों में न्यूनतम होता है।
Vठोस > Vद्रव > Vगैस
एल्युमिनियम > निकिल > स्टील

ध्वनि पर तापमान का प्रभाव:-
– तापमान बढ़ने के साथ ध्वनि की चाल भी बढ़ती है।
(i) जब तापमान में परिवर्तन दोगुना, तिगुना, चौगुना आदि होने पर-
(ii) जब तापमान में परिवर्तन 5oC, 10oC, 25oC आदि होने पर-
voC = v0oC + 0.61t

Note:-
– न्यूटन ने वायु में ध्वनि के संचरण को ‘समतापीय प्रक्रम’ माना लेकिन लाप्लास ने न्यूटन के कथन में संशोधन किया और बताया कि वायु में ध्वनि का संचरण ‘रूद्धोष्म प्रक्रम’ होता है।

ध्वनि पर दाब का प्रभाव:-
– यदि तापमान नियत रहे तो दाब में परिवर्तन से ध्वनि की चाल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

ध्वनि पर घनत्व का प्रभाव:-
– माध्यम का घनत्व बढ़ने पर ध्वनि की चाल कम हो जाती है।

– बारिश होने के बाद जब वायुमण्डल में आर्द्रता बढ़ती है तो घनत्व में कमी आती है जिससे ध्वनि की चाल बढ़ जाती है इसीलिए बारिश के मौसम में दूर की ध्वनि भी सुनाई देती है।

ध्वनि पर गैस के अणुभार का प्रभाव:-
– भारी गैसों में ध्वनि की चाल कम होती है जबकि हल्की गैसों में ध्वनि की चाल अधिक होती है।

ध्वनि के गुण (Properties of Sound)

1. ध्वनि का परावर्तन (Reflection of Sound) प्रकाश की भाँति ध्वनि भी एक माध्यम से चलकर दूसरे माध्यम के पृष्ठ पर टकराने से पहले माध्यम में वापस लौट आती है। इस प्रक्रिया को ध्वनि का परावर्तन कहते हैं।
● ध्वनि का परावर्तन भी प्रकाश के परावर्तन की तरह होता है किन्तु ध्वनि की तरंगदैर्ध्य अधिक होने के कारण इसका परावर्तन बड़े आकार के पृष्ठों से अधिक होता है, जैसे पहाड़, पृथ्वी तल इत्यादि से होते है।

ध्वनि परावर्तन के उपयोग
• प्रतिध्वनि (Echo)- जो ध्वनि किसी दृढ़ दीवार, पहाड़, आदि से टकराने के बाद सुनाई देती है, उसे प्रतिध्वनि कहते हैं। यदि श्रोता परावर्तक सतह के बहुत निकट खडा है, तो उसे प्रतिध्वनि नहीं सुनाई पड़ती है।
● स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए ध्वनि के स्रोत परावर्तक सतह के बीच की न्यूनतम दूरी 17.2 मीटर होनी चाहिए।
● इसका कारण यह है कि जब हमारा कान कोई ध्वनि सुनता है, तो उसका प्रभाव हमारे मस्तिष्क पर 0.1 सेकेण्ड तक रहता है अतः यदि इस अवधि में कोई अन्य ध्वनि भी जाएगी तो वह पहली के साथ मिल जाएगी। इस कारण प्रतिध्वनि सुनने के लिए आवश्यक है कि परावर्तक सतह श्रोता से कम-से-कम इतनी दूरी पर हो कि परावर्तित ध्वनि को उस तक पहुँचने में 0.1 सेकेण्ड से अधिक समय लगे।

प्रतिध्वनि के उपयोग –
● बादलों के गड़गड़ाहट की ध्वनि कई परावर्तक पृष्ठों जैसे-बादलों तथा भूमि से बार-बार परावर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न होती है। प्रतिध्वनियों द्वारा समुद्र की गहराई, वायुयान की ऊँचाई, सुदूर स्थित पहाड़ की दूरी आदि ज्ञात कर सकते हैं।
● ध्वनि का परावर्तन विभिन्न यंत्रों जैसे-मेगाफोन, हॉर्न, स्टैथोस्कोप तथा ध्वनि हॉल में उपयोग होता है।

• स्टैथोस्कोप की कार्यप्रणाली – डॉक्टरों का स्टैथोस्कोप, जिससे वे हृदय तथा फेफड़ों की परीक्षा करते हैं, ध्वनि के परावर्तन पर ही आधारित हैं इसमें एक डिबिया होती है जिसमें तनुपट लगा रहता है। इस डिबिया से दो नलियाँ जुड़ी रहती हैं। डॉक्टर डिबिया को रोगी के सीने पर रखता है तथा नलियों को कानों में लगा लेता है। सीने की धड़कन के कारण डिबिया का तनुपट कंपन करने लगता है, जिससे कि डिबिया के भीतर वायु में ध्वनि तरंगें उत्पन्न हो जाती हैं। ये तरंगें नलियों की दीवारों से बार-बार परावर्तित होकर डॉक्टर के कानों तक पहुँच जाती हैं तथा वह सीने की धड़कन को सुन लेता है।

2. ध्वनि का व्यतिकरण (Interference of Sound)
● जब समान आवृत्ति या आयाम की दो ध्वनि-तरंगें एक साथ किसी बिन्दु पर पहुँचती हैं तो उस बिन्दु पर ध्वनि ऊर्जा का पुनः वितरण हो जाता है। इस घटना को ध्वनि का व्यतिकरण कहते हैं।
● उदाहरण – समुद्र में जगह-जगह पर ऊँचे प्रकाश-घर बनाए जाते हैं, जहाँ से बड़े-बड़े सायरन बजाकर जहाजों को संकेत भेजे जाते हैं।
● कभी-कभी जहाज ऐसे क्षेत्रों में आ जाते हैं। जहाँ उसे सायरन की ध्वनि सुनाई नहीं देती। ऐसे क्षेत्रों को नीरव-क्षेत्र कहते हैं। ऐसे क्षेत्रों में जहाज पर सायरन से सीधे आने वाली ध्वनि व पानी से परावर्तित होकर आने वाली ध्वनि के बीच विनाशी व्यतिकरण होता है, जिससे ध्वनि की तीव्रता अत्यन्त कम हो जाती है।

3. ध्वनि का विवर्तन (Diffraction of Sound) ध्वनि की तरंगदैर्ध्य 1 मी. कोटि की होती है। अतः जब इसी कोटि का कोई अवरोध ध्वनि के मार्ग में आता है तो ध्वनि अवरोध के किनारे से मुड़कर आगे बढ़ जाती है। इस घटना को ध्वनि का विवर्तन कहते हैं।
● जब हम एक कमरे में बोलते हैं तो हमारी आवाज विवर्तन के कारण ही दरवाजों तथा खिड़कियों के किनारों पर मुड़कर दूसरे कमरों तक पहुँच जाती है। चूँकि ध्वनि की तरंगदैर्ध्य लगभग एक मीटर होती है तथा इसी कोटि के हमारे घर के दरवाजे व खिड़कियाँ आदि होती हैं, जिससे ध्वनि का विवर्तन आसानी से हो जाता है

• डॉप्लर प्रभाव (Doppler Effect) इस प्रभाव को जॉन डॉप्लर ने सन् 1842 ई. में प्रस्तुत किया था।
● इसके अनुसार स्रोत की गति के कारण किसी तरंग (ध्वनि तरंग या प्रकाश तरंग) की आवत्ति बदली हुई प्रतीत होती है अर्थात जब तरंग के स्रोत और श्रोता के बीच आपेक्षिक गति होती है तो श्रोता को तरंग की आवृत्ति बदलती हुई प्रतीत होती है। ” आवृत्ति बदली हुई प्रतीत होने की घटना को डॉप्लर प्रभाव कहते हैं।
● जब आपेक्षिक गति से श्रोता तथा स्रोत के बीच दूरी बढ रही होती है तब ध्वनि तरंगों की आवृत्ति घटती हुई प्रतीत होती है।
● जब आपेक्षिक गति के कारण स्रोत और श्रोता के बीच की दूरी घट रही होती है तब आवृत्ति बढ़ती हुई प्रतीत होती है।

उपयोग –
● डॉप्लर प्रभाव के कारण ही जब रेलगाड़ी का इंजन सीटी बजाते हुए श्रोता के निकट आता है। तो उसकी ध्वनि बड़ी तीखी अर्थात अधिक आवृत्ति की सुनाई पड़ती है और जैसे ही इंजन श्रोता को पार करके दूर जाने लगता है तो ध्वनि मोटी अर्थात कम आवृत्ति की सुनाई पड़ती है। इसका उपयोग वायु में उड़ते विमान के वेग का अनुमान लगाने में किया जाता है। जल के भीतर चलती पनडुब्बी का वेग ज्ञात किया जा सकता है।

4. ध्वनि का अपवर्तन (Refraction ofSound) ध्वनि तरंगें जब एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाती हैं तो उनका अपवर्तन हो जाता है अर्थात वे अपने पथ से विचलित हो जाती हैं।
● ध्वनि के अपवर्तन का कारण है-विभिन्न माध्यमों तथा विभिन्न तापों पर ध्वनि की चाल का भिन्न-भिन्न होना हैं।
● दिन में ध्वनि का केवल ध्वनि स्रोत के पास के क्षेत्रों में ही सुनाई देना और रात्रि में दूर-दूर तक सुनाई देना ये अपवर्तन के कारण ही होता है।

5. प्रणोदित कंपन (Forced Vibration) कंपन करने वाली वस्तु पर यदि कोई बाह्य आवर्त बल लगाया जाए, जिसकी आवृत्ति वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति से कंपन करने की चेष्टा करती है, किन्तु शीघ्र ही वस्तु आरोपित बल की आवृत्ति से स्थिर आयाम के कंपन करने के लिए बाध्य हो जाती है, तो बाह्य आवर्त बल के प्रभाव में वस्तु द्वारा उत्पन्न इस कंपन को प्रणोदित कंपन कहा जाता है।

ध्वनि प्रदूषण (Noise pollution)

– यदि मनुष्य तीव्र ध्वनि (85 डेसीबल) के संपर्क में लगातार रहे तो मनुष्य के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव देखे जाते हैं। जैसे- श्रवण क्षमता में कमी, मानसिक अवसादन, चिड़चिड़ापन आदि।
– ऐसी तीव्र ध्वनि को ‘शोर’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
– भारत सरकार ने सर्वप्रथम वर्ष 1986-87 में शोर को प्रदूषण मानते हुए उसे ध्वनि प्रदूषण कहा।
– सन् 2000 में ध्वनि प्रदूषण के लिए अलग से अधिनियम बनाया तथा औद्योगिक, व्यावसायिक व आवासीय क्षेत्रों में ध्वनि स्तर की अधिकतम सीमा तय की गई।

शोर से बचने के उपाय

ग्रीन मफलर:-
– राजमार्गों के दोनों ओर सघन वृक्षारोपण करना क्योंकि पेड़ों की पत्तियाँ व तने ध्वनि के अच्छे अवशोषक होते हैं, इस प्रकार ये ध्वनि प्रदूषण नियंत्रित करने में सहायक है।
– औद्योगिक इकाइयों में कार्यरत श्रमिकों को ध्वनि प्रदूषण से बचाने हेतु कर्ण पट्‌ट, Ear muffs का प्रयोग करना चाहिए।
– वे कार्यस्थल जहाँ अधिक ध्वनि उत्पन्न होती हो वहाँ की दीवारों का निर्माण ध्वनि अवशोषक पदार्थों द्वारा करना चाहिए।

ध्वनि तरंगों का परावर्तन एवं प्रतिध्वनि:-
– प्रकाश के समान ध्वनि में भी परावर्तन की क्रिया होती है हालांकि ध्वनि तरंगों का परावर्तन बड़े आकार के ठोस अवरोधकों जैसे बड़े आकार के पहाड़ों में स्पष्ट रूप में होता है।
– जब किसी अवरोधक से परावर्तित ध्वनि हमें पुन: सुनाई देती है तो इसे प्रतिध्वनि कहते हैं।
– मनुष्य के कर्ण व मस्तिष्क पर ध्वनि का प्रभाव 110सेकण्ड तक रहता है, इस दौरान समान प्रकृति की ध्वनि उत्पन्न की जाए तो दोनों ध्वनियों को अलग-अलग नहीं सुन पाते हैं।
– यदि मनुष्य प्रतिध्वनि को स्पष्ट सुनना चाहे तो परावर्तक पृष्ठ उसमें कम से कम 17 मीटर (लगभग) की दूरी पर होना चाहिए।

ध्वनि का बहुल परावर्तन:-
– जब ध्वनि तरंगें परावर्तक पृष्ठ से बार-बार परावर्तित होती है तो परिणामी ध्वनि तरंग की तीव्रता बहुत ज्यादा हो जाती है जिससे ध्वनि तेज सुनाई देती है ये ध्वनि के बहुल परावर्तन के कारण होता है। उदाहरण- शहनाई, स्टेथोस्कोप।

अनुरणन काल ( Reverberation Period):-
 – किसी कक्ष में प्रतिध्वनि जितने समय गूँजती है, अनुरणन काल कहलाता है।
– अच्छे ऑडिटॉरियम में अनुरणन काल बहुत कम होता है।
– 810 सेकण्ड से अधिक इसका मान नहीं होना चाहिए।
 मैक संख्या = वस्तु की चालध्वनि की चाल

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महत्वपूर्ण प्रश्न

ध्वनि किसे कहते हैं ?

ध्वनि एक प्रकार का कम्पन या विक्षोभ है। जो किसी ठोस , द्रव, व गैस से संचारित होती है। मुख्य रूप से उन कम्पनों को ही ध्वनि कहते है।जो मानव के कान से सुनाई पडतो है।

ध्वनि की इकाई कौन है?

डेसीबल

नमस्कार मेरा नाम मानवेन्द्र है। मैं वर्तमान में Pathatu प्लेटफार्म पर लेखन और शिक्षण का कार्य करता हूँ। मैंने विज्ञान संकाय से स्नातक किया है और वर्तमान में राजस्थान यूनिवर्सिटी से भौतिक विज्ञान विषय में स्नात्तकोत्तर कर रहा हूँ। लेखन और शिक्षण में दिसलचस्पी होने कारण मैंने यहाँ कुछ जानकारी उपलब्ध करवाई हैं।

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